मंगलवार, 17 नवंबर 2020

राजस्थानी संस्कृति

 


Rajasthan Culture 

( राजस्थानी संस्कृति परंपरा और विरासत )

राजस्थान की सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के समृध्द प्रदेशो में गिना जाता है संस्कृति एक विशाल सागर है इसके अंतर्गत गांव-गांव, ढाणी- ढाणी, चौपाल, चबूतरे महल – प्रसादों एवं घर – घर जन-जन में समाई हुई है राजस्थान की संस्कृति का स्वरूप राजवाड़ा और सामंती व्यवस्था में देखा जा सकता है तथा संस्कृति में साहित्य और संगीत की अतिरिक्त कला- कोशल, शिल्प, महल, मंदिर, किले, झोपड़ियां को भी अध्ययन किया जाता है जो हमारी संस्कृति के दर्पण हैं संस्कृति के अंदर पोशाक, त्यौहार, रहन-सहन, खान-पान, तहजीब- तमीज सभी संस्कृतिक के अंतर्गत आते हैं

सांस्कृतिक दृष्टि से राजस्थान को 7 प्रमुख भागों में बांटा गया है

1. मारवाड़ ( Marwar )
2. मेवाड़ ( Mewar ) 
3 शेखावटी ( Shekhawati )
4. ढूँढाड़ ( dhundhad )
5. हाड़ौती( hadauti ) 
6. ब्रज ( Braj )
7. मेवाती ( Mewati )

1. मारवाड़ ( marwar ) –

राजस्थान के पश्चिम में स्थित प्राचीन मारवाड़ रियासत का क्षेत्र सांस्कृतिक विभाग के अंतर्गत आता है इसमें जोधपुर, नागौर, पाली, जालोर बाड़मेर आदि जिले आते हैं यह पूरा क्षेत्र थार के मरुस्थल का हिस्सा है इस क्षेत्र की भाषा मारवाड़ी है क्षेत्र में घूमर ,घुड़लो , ढ़ोल, लूर, डांडिया तथा गैर नृत्य किए जाते हैं

2. मेवाड़ ( Mewar ) –

राजस्थान के दक्षिणी तथा दक्षिणी- पूर्वी में स्थित प्राचीन मेवाड़ रियासत संस्कृति विभाग के अंतर्गत आता है इसके अंतर्गत उदयपुर, चित्तौड़ ,राजसमंद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा , भीलवाडा एवं प्रतापगढ़ जिले को सम्मिलित किया गया है यह क्षेत्र मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्र है यहां के लोग वीर स्वाभिमानी एवं स्वतंत्रता प्रिय हैं इस क्षेत्र में मेवाड़ी भाषा बोली जाती है लगभग 1400 वर्षों तक गुहिल वंश का शासन रहा है

3. ढूंढाड़ ( dhundhad ) –

राजस्थान के मध्य एवं मध्य-पूर्व क्षेत्र यानी प्राचीन आमेर रियासत को ढूंढाड़ क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है इसके अंतर्गत जयपुर, दौसा, टोंक जिले आते हैं यहां पर उर्वरक मैदान तथा रेत के टीले पाए जाते हैं यहां पर ढूंढाड़ी भाषा बोली जाती है तथा यहां पर गणगौर तथा बड़ी तीज का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है

4. हाडोती ( hadauti ) –

हाड़ा चौहान द्वारा शासित क्षेत्र को हाडोती कहते हैं इसके अंतर्गत कोटा, बूंदी, झालावाड़ , बांरा आदि क्षेत्र आते हैं यह पूरा क्षेत्र मुख्यतः पठारी है तथा यहां पर बड़े सरोवर, नदियां, हरे-भरे उपजाऊ मैदान भी हैं यहां पर मुख्यतः काली मिट्टी और चिकनी मिट्टी पाई जाती है इस क्षेत्र में न्हाण प्रसिद्ध लोक नाट्य है

5. शेखावटी ( Shekhawati )-

इस क्षेत्र पर कच्छावा राजकुमार शेखा के वंशजों का शासन रहा है इसलिए इसे शेखावटी क्षेत्र कहा जाता है इस क्षेत्र में मुख्यतः चुरू, सीकर, झुंझुनू जिले आते हैं इस क्षेत्र का संपूर्ण भाग रेतीले धोरे तथा मैदान स्थित है इस क्षेत्र पर कई नदियों के किनारे प्राचीन काल की सभ्यता विधमान है इसका खेतड़ी क्षेत्र तांबे के लिए जाना जाता है इस क्षेत्र में हवेलियां, भित्तिचित्र , गीदड़ नृत्य अधिक प्रसिद्ध है

6. ब्रज ( Braj )-

भरतपुर, धौलपुर एवं करौली जिले को इस भाग में सम्मिलित किया गया है क्योंकि यह जो भाग मथुरा के चौरासी कोस के घेरे में आते हैं इस क्षेत्र में ब्रज भाषाएं बोली जाती है जो काफी मधुर लोकप्रिय है नौटंकी और रासलीला आदि लोक नाटकों का आयोजन भी इसी क्षेत्र में किया जाता है

7. मेवात ( mewati )-

अलवर, भरतपुर जिलों का जो हिस्सा गुड़गांव की तरफ स्थित है उसमे मेव जाति बड़ी संख्या में निवास करती है और इन लोगों का रहन सहन वेशभूषा खानपान आदि की विशेषताएं युक्त है इसलिए इसे क्षेत्र को मेवात कहतेे हैं

राजस्थानी संस्कृति एक बेहतरीन नीरा है जो गॉव- ढाणी, चौपाल-पनघट ,महल -झोपड़ी कीले -गढ़ी ,खेत -खलियान से बहती हुई जन-जन रुपी सागर के संस्पर्श से इंद्रधनुषी छटा बिखेरती है और अपनी महक के साथ पर्व, मेले, तीज, त्योहा, नाट्य -नृत्य ,श्रंगार ,पहनावा, रीति-रिवाज ,आचार ,व्यवहार आदि में प्रतिबिंबित होती है तथा जिसे रेत के धोरों के साथ-साथ वायुमंडल 9 वसुंधरा और रोम रोम में उल्लसित और तरंगित अनुभूत किया जा सकता है

राजस्थानी संस्कृति समष्टिगत समन्वयात्मक और प्राचीन है भौगोलिक विविधता और प्राकृतिक वैभव ने इसे और आकर्षक बनाया है वस्तुत: राजस्थानी संस्कृति लोक जीवन को प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कृति है

पधारो म्हारे देश के निमंत्रण की संवाहक राजस्थानी संस्कृति सांस्कृतिक पर्यटन की पर्याय है 33 जिलों को अपने आंचल में समेटे राजस्थान की धरती सांस्कृतिक परंपराओं का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती है

राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराएं विरासत से जुड़े स्थल प्रकृति और वन्य जीव की विविधता और देदीप्यमान इतिहास पर्यटन के खुला आमंत्रण हैं समृद्ध लोक संस्कृति के परिचायक तीज-त्यौहार उमंग के प्रतीक मेले आस्था और विश्वास के प्रतीक लोकदेवता फाल्गुन की मस्ती में नृत्य करती आकर्षक पायदान से युक्त महिलाएं पर्यटकों को चमत्कृत करने के लिए पर्याप्त है धरती धोरारी की झिलमिलाती रेत और गूंजता सुरीला लोक संगीत पर्यटक को अभिभूत करने वाला होता है

राजस्थान की संस्कृति और परंपरा की मुख्य बात यह है कि राजस्थान के जनमानस की विशालता ने जिस प्रकार सभी मान्यताओं और आस्थाओं को फलने-फूलने दिया उसी प्रकार अनेक अनुयायियों के साथ भातृभाव रखा

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह ईश्वर के श्रद्धालुओं का आस्था और विश्वास का केंद्र है जिस में न धर्म की पाबंदी है न जाती कि ,ना देश की ,ना संप्रदाय की ।हिंदू मुसलमान सिख और अन्य धर्मावलंबी सभी दरगाह पर अकीदत के फूल चढ़ाते हैं मनौतियां मांगते हैं आज अजमेर सूफी मत का अंतरराष्ट्रीय प्रमुख तीर्थ है

पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के नाकोडा भैरव जैनियों के पूजनीय तो है ही और सनातनियों के भी माने हैं मेवाड़ के केसरियाजी जैनियों के भी मान्य हैं तो सनातनियों के भी यही स्थिति उन लोग देवताओं की भी है जिन्होंने यहां के सुदूर अंचलों में स्थित आदिवासियों जनजातियों और किसानों को सदियों से आस्था के सूत्र में बांधे रखा आज भी बाबा रामदेव उत्तर भारत के पूजनीय लोक देवताओं में प्रमुख है लोक गायकों द्वारा पाबूजी की फड़( सचित्र गुणावली) गेय बाँचने की प्रथा मध्य काल से आज भी चली आ रही है

राजस्थान के मध्यकालीन संत और उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित मठ ,रामद्वारा, मेलो, समागमों और यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता के यशस्वी प्रयास का सूत्रपात हुआ 

संतों की मानव कल्याण की कामना और प्रेमी भक्ति के सिद्धांतों ने यहां के समाज में भावनात्मक एकता के आयाम के नवीन पट खोले । मन मिलाने का जो प्रयास संतों द्वारा जिस सहजता से किया गया वह स्तुत्य है और यहां की संस्कृति की पहचान है

राजस्थानी लोग अपनी संस्कृति और परंपरा पर गर्व करते हैं उनका दृष्टिकोण परंपरागत है यहां साल भर में लो और पर्व-त्योहारों का तांता लगा रहता है या एक कहावत प्रचलित है सात वार नो त्योहार राजस्थान के मेले और पर्व त्यौहार रंगारंग और दर्शनीय होते हैं यह पर्व त्यौहार लोगों के जीवन उनकी खुशियां और उमंग के परिचायक हैं प्राय:इन मेलों और त्योहारों के मूल में धर्म होता है

लेकिन इनमे कई मेले और त्यौहार अपने सामाजिक और आर्थिक महत्व के परिचायक हैं मनुष्य और पशु की अंतर निर्भरता को दर्शाने वाले पशु मेले राजस्थान की पहचान है पुष्कर का कार्तिक मेला ,परबतसर और नागौर के तेजाजी का मेला जो मूलतः धार्मिक है राज्य के बड़े पशु मेले माने जाते हैं

राजस्थान में तीज को त्योहारों में पहला स्थान दिया जाता है राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है तीज-त्यौहार बावरी ले डूबी गणगौर इसका अर्थ है कि त्योहारों के चक्र की शुरुआत श्रावण महीने में 30 से होती है और साल का अंत गणगौर से होता है गणगौर धार्मिक पर्व होने के साथ ही राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है तीज गणगौर जैसे पर महिलाओं के महत्व को भी रेखांकित करते हैं

राजस्थान में पूरा संपदा का अटूट खजाना है राजस्थान पर प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की छटा है तो ,कहीं हड़प्पा संस्कृति के पूर्व के प्रबल प्रमाण तो ,कहीं पर प्राचीन काल में धातु प्रयोग के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं । कहीं गणेश्वर का ताम्र वैभव तो ,कहीं प्रस्तर प्रतिमाओं का शैल्पिक प्रतिमान, कहीं शिलालेखों के रूप मे पाषाणों पर उत्कीर्ण गौरवशाली इतिहास तो ,कहीं मृण मूर्तियां और मृदभांड से लेकर धातु प्रतिमाओं तक का शिल्प शास्त्र ,कहीं काल की गवेषणा करते प्राचीन सिक्के तो ,कहीं वास्तुकला के उत्कृष्ट प्रतीक बिखरे पड़े हैं

उपासना स्थल, भव्य प्रासाद ,अभेद्य दुर्ग और जीवन स्मारकों का संगम राजस्थान के कस्बों शहरों और उजड़ी बस्तियों में देखने को मिलता है आमेर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी ,उदयपुर, शेखावाटी के मनोहारी विशाल प्रासाद और रण कपूर ,ओसिया, देलवाड़ा, झालरापाटन के उत्कृष्ट कलात्मक मंदिर और जैसलमेर की पटवो की शानदार हवेलियां इत्यादि ऐसे ही कुछ प्रतीक है जिन पर राजस्थानी कलाकारों के हस्ताक्षर हैं

राजस्थान की संस्कृति विरासत में राजस्थान के दुर्गों का भी महत्वपूर्ण स्थान है राजस्थान के ख्यातनाम दुर्गों में चित्तौड़ ,जैसलमेर ,रणथंबोर, गागरोन ,जालौर, सिवाना और भटनेर का दुर्ग ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध रहे हैं इनके साथ शूरवीरों के पराक्रम और वीरांगनाओं के जोर की रोमांचक कथाएं जुड़ी है जो भारतीय इतिहास की अनमोल धरोहर है

राजस्थान के जनमानस को यह दुर्ग और उनसे जुड़े आख्यान सदा से ही प्रेरणा देते आए हैं वीरता और शौर्य के प्रतीक यह गढ़ और किले अपने अंगूठे स्थापत्य विशिष्ट संरचना अद्भुत शिल्पा और सौंदर्य के कारण दर्शनीय हैं

राजस्थान की चित्र शैलियां इसके वैभव का प्रमाण है बूंदी नाथद्वारा किशनगढ़ उदयपुर जोधपुर जयपुर आंधी राजस्थान की चित्रकला के रंगीन प्रश्न हैं जिनमें श्रृंगारिकता के साथ लौकिक जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है राजस्थानी शैली गुजराती और जैन शैली के तत्व को अपने में समेट कर मुगल शैली में संबंधित हुई है

राजस्थान की वीर और वीरांगना ने जहां रणक्षेत्र में तलवारों का जौहर दिखाकर विश्व इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया है वही भक्ति और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी राजस्थान पीछे नहीं रहा यहां मीरा और दादू भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत रहे हैं

भक्ति गीतों में जहां एक और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिष्ठा मिले वही व्यक्ति स्वातंत्र्य का स्वर फूटा और लोक परक सांस्कृतिक चेतना उजागर हुई है इस चेतना का परिपाक हमें राजस्थान के मेलों और त्योहारों में दिखाई देता है यहां के मेलों और त्योहारों के आयोजन में संपूर्ण लोकजीवन पूरी सक्रियता के साथ शामिल होकर अपने भावनात्मक एकता का परिचय देता है

राजस्थान की संस्कृति परंपरा विरासत में राजस्थानी लोक नृत्य का भी विशेष महत्व रहा है लोक नृत्य राजस्थानी संस्कृति के वाहक हैं यहां के लोक नृत्य में लय ताल गीत सूर आदि का सुंदर संतुलित सामंजस्य देखने को मिलता है गैर चंग गीदड़ घूमर ढोल आदि राजस्थान के जन जीवन की संजीवनी बूटियॉ हैं इस बूटी की घूटी को लेकर राजस्थान के जनजीवन और लोकमानस नीबू का नंगा रहते हुए भी मस्ती और परिश्रम से जीना सीखा है

राजपूताने में अनेक वीर विद्वान और कुलाभिमानी राजा सरदार आदी हुए जिन्होंने अनेक युद्धों में अपने प्राणों की आहुति दे कर अपनी कीर्ति को अमर बना दिया राजपूत जाति की वीरता विश्व प्रसिद्ध रही है

चित्तौड़गढ़ ,कुंभलगढ़, मांडलगढ़ ,अचलगढ़ , रणथंबोर, गागरोन ,भटनेर (हनुमानगढ़), बयाना ,सिवाना ,मंडोर ,जोधपुर, जालौर आमेर आदी किलो और अनेक प्रसिद्ध रण क्षेत्र में कई बड़े-बड़े युद्ध हुए जहां अनेक वीर राजपूतों ने वहां की मिट्टी का एक एक कण अपने रक्त से तर किया कई स्थानों पर राजपूत क्षत्राणियों ने शत्रु का सामना किया सचमुच राजपूताना की धरती असाधारण रही है

इसीलिए कर्नल टोड को कहना पड़ा–राजस्थान में कोई छोटा सा राज्य भी ऐसा नहीं है जिस में थर्मोपल्ली जैसी रणभूमि ना हो और शायद ही ऐसा नगर मिले जान लियोनीडॉस जैसा वीर पुरुष उत्पन्न हुआ हो

12 वीं शताब्दी के अंत से ही राजपूताने का इतिहास में भारी हेर फेर शुरू हो गया था इसका कारण भारत में मुस्लिम शक्ति का प्रवेश था राजस्थान में मुस्लिम सत्ता की स्थापना पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ शुरू हुई राजपूत शासकों और सामंतों ने बार बार इस बाह्य सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया यह सिलसिला आगामी लगभग 4 शताब्दियों तक चलता रहा सत्ता संघर्ष में राजपूत निर्णायक लड़ाई नहीं जीत सके इस कारण राजपूतों में असाधारण आपसी सहयोग का अभाव युद्ध लड़ने की कमजोर रणनीति और सामंतवाद था 

कुछ सदियों पश्चात राणा कुंभा और राणा सांगा के नेतृत्व में सर्वोच्चता की स्थापना राजपूताने में संभव हो सकी थी अपनी वीरता और तलवार के बल से राणा सांगा ने बहुत गौरव प्राप्त कर लिया था उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि मालवा गुजरात और दिल्ली के सुल्तानों में से कोई भी अकेला उसे हरा नहीं सकता था और युद्ध क्षेत्र में उसी का सामना करते हुए पानीपत के वीर विजेता और दिल्ली के प्रथम सम्राट बाबर ने अपनी पराजय की प्रबल आशाओं से घबराकर भविष्य में मदिरापान न करने की शपथ ली तथा अजित कीर्ति और स्वयं को बचाने के लिए यह विदेशी “भारत विजेता” चिंतित हो उठा था

मुगलों का पतनोमुख काल राजपूताना के लिए हितकर नहीं रहा इतिहास में कई बार यह विडंबना देखने को मिलती है कि जब कोई शक्ति दूसरी से निजात पाने के लिए संघर्ष कर अपने मकसद में कामयाब हो जाती है तो भी वह बेहतर स्थिति के बजाए बदतर हालत में पहुंच जाती है इसका कारण शायद यह होता है कि बदले हुए हालत के लिए फुर्सत नहीं होती है कई बार ऐसा भी होता है कि मिलजुलकर कटी पतंग को लूट लिया जाता है परंतु पतंग प्राप्ति के बाद उस पर अधिकार आदि प्रश्नों को लेकर कुछ नहीं सोचा जाता है इसका परिणाम अंततः पतंग की लूटपाट में पतंग का फटना होता है इस प्रकार नियोजित ढंग से तैयार तंत्र के अभाव में बना हुआ खेल बिगड़ जाता है

यही बात मुगल सत्ता के प्रमुख काल में राजपूताने में हुई राजपूत शासकों को मराठों की लूट खसोट का कई बार सामना करना पड़ा ।अपने ही सामंतो का विरोध और पिंडारी के दमन चक्र ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया विवश होकर राजपूत शासकों ने ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार कर लिया

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत राजपूताने का इतिहास एक निश्चित आकार और पहचान पा सका एक ऐसी भौगोलिक अभिव्यक्ति को प्राप्त कर सका जिसे अंततः भारत के नक्शे में राजस्थान प्रांत की उपस्थिति दर्ज हो सके कई सामाजिक बुराइयों से मुक्ति पा सका और आधुनिकरण की राह पर चल सका परंतु यह सब दुर्भाग्यवश आर्थिक शोषण पराधीनता बर्बादी और कलंक की कीमत पर राजपूताना प्राप्त कर सका वस्तुत: को ब्रिटिश संरक्षण की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी उन्हें अपनी और अपने आपसी विवादों को भी अंग्रेजों की मध्यस्ता के निर्णय हेतु प्रस्तुत करने का वचन देना पड़ा सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सर्वोच्च सत्ता के साथ अपने संबंधों के दावे को भी त्यागना पड़ा और ब्रिटिश सरकार के प्रति अधीनस्थ की नीति का पालन करने के लिए विवश होना पड़ा

राजस्थान की संस्कृति लोक संस्कृति है इसकी विशिष्ट पहचान है राजस्थान की लोक संस्कृति वीरों और वीरांगनाओं की वीरतापूर्ण कृत्यों और धार्मिक दार्शनिक मान्यता और आस्थाओं से परिपूर्ण है राजस्थानी लोक संस्कृति का स्वरूप वृहत है यह स्वरूप ग्रामीण अंचल से लेकर नगरों के सभ्य समाज तक विस्तारित है।

राजस्थान का इतिहास यहां की लोक संस्कृति की कीर्ति कथाओं का बखान करता है मनुष्य के जन्म से लेकर मनुष्य की मृत्यु तक के संस्कारों में लोक संस्कृति दृष्टिगत होती है यहां के तीज त्यौहार और विवाह के अवसर पर महिलाओं के नख-शिख श्रृंगार लोक संस्कृति को परिलक्षित करते हैं लोक संस्कृति में आदर्श और नैतिक मूल्य और परंपराओं का संपुट है जो नई पीढ़ी को शिक्षा देता है लोक संस्कृति का स्वरूप लोक गीत और लोक गाथाओं लोकनाट्य में सदियों की विरासत को समेटे हुए हैं

यहां के तीज त्यौहार तीर्थ रीति रिवाज सामाजिक पारिवारिक संबंध व मेलों में लोक संस्कृति के स्पष्टत दर्शन होते हैं व्रत त्योहार उत्सव मेले राजस्थानी लोक जीवन के अटूट अंग हैं देवी देवताओं में अटूट विश्वास यहां के लोक समाज की विशेषता है लोक जीवन की अनगिनत अनुभूतियों का उदात स्वरूप ही लोक संस्कृति है 

राजस्थानी अंचल की सांस्कृतिक परंपराएं लोक गीत लोक कथाएं लोक कहावतें लोक देवी देवताओं की धरोहर को जनजाति समाज ने आज भी संजोए रखा है साहित्य में लोक साहित्य अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है लोक साहित्य में लोकगीतों का एक विशेष स्थान है लोकगीतों के माध्यम से यहां त्यौहारों और पर्वों से जुड़ी कथाओं की अभिव्यक्ति होती है

वही गाने और सुनने वालों का मन आह्लाद से झूम उड़ता है इनके गाने का कोई स्थान और समय निश्चित नहीं होता लोकगीत समुदाय की धरोहर है यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनाए जाते हैं राजस्थानी समाज की आत्मा लोक गीतों की धुन में गुनगुनाती रहती है यदि लोग जीवन में से लोकगीत और लोकनृत्य को निकाल दिया जाए तो ग्रामीण बाहुल्य समाज विशेष रूप से आदिवासी समाज का जीवन निरसता की ओर अग्रसर होने लगेगा और कृत्रिम और छिछले मनोरंजन साधनों की ओर अग्रसर होने लगेगा

लोकगीत विश्वास और आस्था युक्त घटनाओं पर आधारित होते हैं जिनके द्वारा यह इतिहास और मिथक का स्मरण करते हैं लोकगीत जनमानस की भाषा और संस्कृति है

राजस्थान में परवाड़ा लोकगाथा लोक साहित्य की मौखिक विधा है परवाडो़ की सजीवता आकर्षक का सरलता और संगीतात्मक का विशेष उल्लेखनीय हैं परवाडे़ सभी अवदान के रूप में है किसी न किसी वीर का चरित्र इन में रहता है यो भले ही इन की कथावस्तु पूर्णता ऐतिहासिक ना हो पर कथा वस्तु का बिंदु अवश्य ऐतिहासिक होता है लोक वीरों का कीर्तिमान ही परवाडा़ है इन में कतिपय है आवड़ माता के परवाडे़,करणी माता के परवाडे पाबूजी राठौर के परवाडे़, देवनारायण के परवाडे, जीण माता के परवाडे हड़बूजी सांखला और मेहाजी मांगलिया के परवाडे हीर रांझा के परवाडे तेजाजी के परिवाडे़ आदि

 


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020




नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (सीएए) - यूपीएससी के लिए विस्तार से बताया गया बिल


नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए बिल) को पहली बार लोकसभा में 2016 में नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन करके पेश किया गया था। इस विधेयक को एक संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था, जिसकी रिपोर्ट बाद में 7 जनवरी, 2019 को प्रस्तुत की गई थी। नागरिकता संशोधन विधेयक 8 जनवरी 2019 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया, जो 16 वीं लोकसभा के विघटन के साथ समाप्त हो गया। यह विधेयक 9 दिसंबर 2019 को फिर से 17 वीं लोकसभा में गृह राज्य मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किया गया था और बाद में 10 दिसंबर 2019 को पारित किया गया था। राज्यसभा ने भी 11 दिसंबर को विधेयक पारित किया। 
सीएए को 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश करने वाले अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए पारित किया गया था। यह अधिनियम छह अलग-अलग धर्मों जैसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और अफगानिस्तान, बांग्लादेश और ईसाइयों के प्रवासियों के लिए पारित किया गया था। पाकिस्तान। किसी भी व्यक्ति को इस अधिनियम के लिए योग्य माना जाएगा यदि वह पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से 11 के लिए भारत में रहा हो। अवैध प्रवासियों के निर्दिष्ट वर्ग के लिए, निवास के वर्षों की संख्या को 11 वर्ष से घटाकर पांच वर्ष कर दिया गया है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)UPSC सिलेबस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है उम्मीदवार इस लेख के अंत में पीडीएफ नोट्स भी डाउनलोड कर सकते हैं।
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (सीएए): - यहां पीडीएफ डाउनलोड करें
2,13,158

सीएए 2019

  • नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को संसद की मंजूरी मिली।

नागरिकता क्या है?

  • नागरिकता राष्ट्र और राष्ट्र का गठन करने वाले लोगों के बीच संबंधों को परिभाषित करती है।
  • यह व्यक्ति द्वारा राज्य के संरक्षण, मतदान का अधिकार और कुछ लोगों के बीच कुछ सार्वजनिक कार्यालयों को रखने के अधिकार के रूप में अलग-अलग अधिकारों पर निर्भर करता है, बदले में व्यक्ति द्वारा राज्य के लिए कुछ कर्तव्यों / दायित्वों की पूर्ति के लिए।
भारत में नागरिकता
  • भारत का संविधान पूरे भारत के लिए एकल नागरिकता प्रदान करता है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 11 केतहत , संसद को कानून द्वारा नागरिकता के अधिकार को विनियमित करने की शक्ति है। तदनुसार, संसद ने भारतीय नागरिकता के अधिग्रहण और निर्धारण के लिए 1955 में नागरिकता अधिनियम पारित किया था  
  • प्रवेश 17, सातवीं अनुसूची के तहतसूची 1 नागरिकता, प्राकृतिककरण और एलियंस के बारे में बोलती है। इस प्रकार, संसद के पास नागरिकता के संबंध में कानून बनाने की विशेष शक्ति है।
  • 1987 तक , भारतीय नागरिकता के योग्य होने के लिए, यह भारत में पैदा होने वाले व्यक्ति के लिए पर्याप्त था।
    • फिर, बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासन का आरोप लगाते हुए लोकलुभावन आंदोलनों द्वारा, नागरिकता कानूनों को पहले संशोधित करने की आवश्यकता थी इसके अलावा कम से कम एक माता-पिता को भारतीय होना चाहिए।
  • 2004 में , इस कानून में संशोधन किया गया था कि केवल एक माता-पिता भारतीय न हों; लेकिन दूसरे को अवैध आप्रवासी नहीं होना चाहिए।
भारत में नागरिकता के बारे में अधिक जानने के  लिए, लिंक किए गए पृष्ठ को देखें।

भारत में अवैध प्रवासी कौन है?

अधिनियम के तहत, एक अवैध प्रवासी एक विदेशी है जो:
  • पासपोर्ट और वीजा जैसे वैध यात्रा दस्तावेजों के बिना देश में प्रवेश करता है, या
  • वैध दस्तावेजों के साथ प्रवेश करता है, लेकिन अनुमत समय अवधि से परे रहता है।
अवैध प्रवासियों को जेल या विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत निर्वासित किया जा सकता है।
अधिनियम के पारित होने से पहले का परिदृश्य
  • मौजूदा कानूनों के तहत, एक अवैध प्रवासी नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदन करने के लिए योग्य नहीं है । उन्हें पंजीकरण या प्राकृतिककरण के माध्यम से भारतीय नागरिक बनने से रोक दिया जाता है।
    • विदेशी व्यक्ति अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम ऐसे व्यक्ति को जेल भेजते हैं और अवैध प्रवासी को जेल या निर्वासन में डाल देते हैं।
  • एक व्यक्ति पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिक बन सकता है 
    • 1955 की नागरिकता अधिनियम की धारा 5 (ए) : भारतीय मूल का एक व्यक्ति जोपंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत में सामान्य रूप से निवास करता है ;
    • और उन्हें नागरिकता के लिए आवेदन जमा करने से पहले 12 महीनों तक लगातार भारत में रहना चाहिए था।
  • नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत,प्राकृतिककरण द्वारा नागरिकता के लिए आवश्यकताओं में से एक यह है कि आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान भारत में निवास करना चाहिए, साथ ही पिछले 14 वर्षों में से 11 के लिए।
अधिनियम क्या करने का इरादा रखता है?
  • नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 का उद्देश्य नागरिकता अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और विदेश अधिनियम में बदलाव करना है यदि अवैध प्रवासी बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तीन पड़ोसी देशों के धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों से हैं।
  • सीधे शब्दों में कहें, नागरिकता संशोधन अधिनियम गैर कानूनी मुस्लिम प्रवासियों को कानूनी दस्तावेजों और अनुमति के बिना भारत आने के बावजूदकानूनी प्रवासियों की स्थिति प्रदानकरेगा।

सीएए 2019 की विशेषताएं

  • यह अधिनियम भारत की नागरिकता के लिए योग्य अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अवैध प्रवासियोंको बनाने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन करना चाहता है । दूसरे शब्दों में, अधिनियम का इरादा भारत के तीन मुस्लिम-बहुल पड़ोसियों से गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारत का नागरिक बनाना आसान बनाना है।
    • यह कानून उन लोगों पर लागू होता है जो धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर या मजबूर थे। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को अवैध प्रवास की कार्यवाही से बचाना है।
  • संशोधन इन छह धर्मों से संबंधित आवेदकों के लिए एक विशिष्ट शर्त के रूप में 11 साल से 5 साल तकप्राकृतिककरण की आवश्यकता कोशांत करता है।
  • नागरिकता के लिए कट ऑफ तिथि 31 दिसंबर 2014 है , जो आवेदक पर या उस तारीख से पहले भारत में प्रवेश किया जाना चाहिए था मतलब है।
  • अधिनियम कहता है कि नागरिकता प्राप्त करने पर:
    • ऐसे व्यक्तियों को भारत में उनके प्रवेश की तारीख से भारत का नागरिक माना जाएगा, और
    • उनके अवैध प्रवास या नागरिकता के संबंध में उनके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही बंद कर दी जाएंगी।
  • यह भी कहता है कि भारत के प्रवासी नागरिक (ओसीआई) कार्ड रखने वाले लोग - एक आव्रजन स्थिति जो भारतीय मूल के एक विदेशी नागरिक को भारत में रहने और काम करने के लिए अनिश्चित काल के लिए अनुमति देती है - अगर वे प्रमुख और छोटे अपराधों और उल्लंघन के लिए स्थानीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं तो वे अपना दर्जा खो सकते हैं।
अपवाद
  • अधिनियम में कहा गया है कि अवैध प्रवासियों के लिए नागरिकता संबंधी प्रावधान असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों परलागू नहीं होंगे , जैसा कि संविधान की छठी अनुसूची में शामिल है।
    • इन आदिवासी क्षेत्रों में कार्बी आंगलोंग (असम में), गारो हिल्स (मेघालय में), चकमा जिला (मिजोरम में), और त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र जिले शामिल हैं।
  • यह बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत इनर लाइन परमिट के तहत आने वाले क्षेत्रों पर भी लागू नहीं होगा 
आलोचना
यह मुसलमानों के खिलाफ है
  • अधिनियम की मौलिक आलोचनायह रही है कि यह विशेष रूप से मुसलमानों को लक्षित करता है। इस प्रकार, नागरिकता का धार्मिक आधार न केवल धर्मनिरपेक्षता, बल्कि उदारवाद, समानता और न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है।
    • यह पाकिस्तान में शिया, बालोची और अहमदिया मुसलमानों औरअफ़गानिस्तान में हज़ारों को, जो उत्पीड़न का सामना करते हैं, नागरिकता के लिए आवेदन करने की अनुमति देने में विफल रहता है 
    • सीएए के खिलाफ एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि यह म्यांमार और श्रीलंका में सताए गए लोगों तक नहीं पहुंचेगा, जहां से रोहिंग्या मुस्लिम और तमिल देश में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं।
    • न तो धार्मिक उत्पीड़न तीन देशों का एकाधिकार है और न ही ऐसा उत्पीड़न गैर-मुसलमानों तक सीमित है।
यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है
  • आलोचकों का तर्क है कि यहसंविधान के अनुच्छेद 14 काउल्लंघन है , जो समानता के अधिकार की गारंटी देता है।
    • सीएए अनुच्छेद 14 के दांतों में है, जो न केवल उचित वर्गीकरण और तर्कसंगत और किसी भी वर्गीकरण के लिए प्राप्त होने वाली तर्कसंगत वस्तु की मांग करता है, बल्कि इसके अलावा हर ऐसे वर्गीकरण को गैर-मनमाना होना चाहिए ।
    • अधिनियम वर्ग कानून का एक उदाहरण है के रूप में धर्म के आधार पर वर्गीकरण की अनुमति नहीं है,।
नॉर्थ ईस्ट सीएए को क्यों आपत्ति है?
  • में उत्तर-पूर्वी राज्यों , अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की भारी संख्या के लिए नागरिकता की संभावना गहरी चिंताओं शुरू हो रहा है, सहित जनसांख्यिकीय परिवर्तन की आशंका , आजीविका के अवसर की हानि, और स्वदेशी संस्कृति का क्षरण।
  • अधिनियम असम समझौते का अक्षर और आत्मा दोनों में उल्लंघन करता प्रतीत होता है 
    • असम समझौते, तत्कालीन राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के बीच, 24 मार्च, 1971 को विदेशी प्रवासियों के लिए कटऑफ की तारीख तय की गई थी। इस तारीख के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को पता लगाया जाना चाहिए और उनके धर्म के बावजूद निर्वासित किया जाना चाहिए।
    • नागरिकता संशोधन अधिनियम ने छह धर्मों के लिए कटऑफ की तारीख 31 दिसंबर, 2014 को स्थानांतरित कर दी, जो ब्रह्मपुत्र घाटी में असमिया भाषी लोगों के लिए स्वीकार्य नहीं है, जो इस बात पर जोर देते हैं कि सभी अवैध आप्रवासियों को अवैध माना जाना चाहिए।
  • आर्थिक समस्या भी है । यदि बांग्लादेश से दसियों हजार लोग निकलते हैं और असम और उत्तर पूर्व में कानूनी रूप से रहना शुरू करते हैं, तो दबाव सबसे पहलेप्रमुख आर्थिक संसाधन-भूमि में दिखाई देगा।
    • इसके अतिरिक्त, क्योंकि इन वैध नागरिकों हो जाएगा, वहाँ भी अधिक लोगों की कतार में शामिल होने के लिए किया जाएगा नौकरीकी उम्मीद लगाए बैठे है कि संभावित स्वदेशी और स्थानीय लोगों के लिए अवसर कम कर सकते हैं।
  • इससे राज्य के लोगों केराजनीतिक अधिकारों का भीहनन होता है। असम में पलायन एक ज्वलंत मुद्दा रहा है।
    • एक विचार है कि अवैध आप्रवासियों, जो अंततः वैध नागरिक बन जाएंगे, राज्य के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करेंगे।
सीएए के आसपास के अन्य मुद्दे
  • सीएए यहूदियों और नास्तिकों को नहीं मानता है। उन्हें अधिनियम से बाहर कर दिया गया है।
  • अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक साथ जोड़ने और अन्य (पड़ोसी) देशों को छोड़कर का आधार स्पष्ट नहीं है।
    • एक सामान्य इतिहास एक आधार नहीं है क्योंकि अफगानिस्तान कभी भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था और हमेशा एक अलग देश था।
  • नेपाल, भूटान और म्यांमार जैसे देश, जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करते हैं, को बाहर रखा गया है ।
    • अधिनियम के 'वस्तुओं और कारणों का विवरण' में कहा गया है कि ये तीन देश संवैधानिक रूप से एक "राज्य धर्म" प्रदान करते हैं;इस प्रकार, अधिनियम इन धार्मिक राज्यों में "धार्मिक अल्पसंख्यकों" की रक्षा करना है।
    • उपरोक्त तर्क भूटान केसंबंध में विफल है , जो पड़ोसी और संवैधानिक रूप से एक धार्मिक राज्य है जिसमें आधिकारिक धर्म वज्रयान बौद्ध धर्म है ।
      • गैर-बौद्ध मिशनरी गतिविधि सीमित है, गैर-बौद्ध धार्मिक इमारतों का निर्माण निषिद्ध है और कुछ गैर-बौद्ध धार्मिक त्योहारों का जश्न मनाया जाता है। फिर भी, भूटान को सूची से बाहर रखा गया है।
    • केवल धार्मिक उत्पीड़न पर ध्यान दें:
      • व्यक्तियों के वर्गीकरण पर, अधिनियम केवल एक प्रकार के उत्पीड़न के पीड़ितों को लाभ प्रदान करता है, अर्थात धार्मिक उत्पीड़न दूसरों की उपेक्षा।
      • धार्मिक उत्पीड़न एक गंभीर समस्या है लेकिन राजनीतिक उत्पीड़न भी दुनिया के कुछ हिस्सों में समान रूप से मौजूद है । यदि इरादा उत्पीड़न के शिकार लोगों की रक्षा करना है, तो इसे केवल धार्मिक उत्पीड़न तक सीमित रखने का तर्क संदेहास्पद है।
    • सीएए के प्रतीत नहीं होने वाले असंवैधानिक प्रावधानकानून को समान रूप से रखे गए व्यक्तियों को समान सुरक्षा से वंचितकरेंगे जो भारत में "अवैध प्रवासियों" के रूप में आते हैं लेकिन वास्तव में अधिक योग्य की कीमत पर कम योग्य नागरिकता को नागरिकता प्रदान करते हैं।
      • सीएए के प्रावधानों से एक ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां एक रोहिंग्या जो खुद को म्यांमार में भारत में पार करके खुद को नुकसान से बचाता है, नागरिकता के लिए विचार करने का हकदार नहीं होगा, जबकि बांग्लादेश से एक हिंदू, जो एक आर्थिक प्रवासी हो सकता है और सामना नहीं किया है। उनके जीवन में कोई प्रत्यक्ष उत्पीड़न, नागरिकता का हकदार होगा।
      • इसी तरह, जाफना से एक तमिल श्रीलंका में अत्याचारों से बचने के लिए एक "अवैध प्रवासी" बना रहेगा और कभी भी प्राकृतिक रूप से नागरिकता के लिए आवेदन करने का हकदार नहीं होगा।
    • प्राकृतिककरण के लिए आवासीय आवश्यकता में भी कमी है - 11 साल से पांच तक। चुने गए समय सीमा के कारणों को नहीं बताया गया है।
अधिनियम के समर्थकों द्वारा तर्क सामने रखे गए
यह मुसलमानों के खिलाफ नहीं है
  • अहेडिय़ा और रोहिंग्या अभी भी प्राकृतिककरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं (यदि वे वैध यात्रा दस्तावेजों के साथ प्रवेश करते हैं)।
    • किसी भी मामले में, चूंकि भारत गैर-वापसी के सिद्धांत का पालन करता है (यहां तक ​​कि शरणार्थी कन्वेंशन 1951 में आरोप लगाए बिना), उन्हें पीछे नहीं धकेला जाएगा।
    • यदि कोई शिया मुस्लिमउत्पीड़न का सामना कर रहा है और भारत में शरण मांग रहा है, तो शरणार्थी के रूप में भारत में निवास करने के लिए जारी रहने वाले उसके मामले को उसकी योग्यता और परिस्थितियों पर विचार किया जाएगा।
    • साथ बलूची शरणार्थियों के संबंध में , बलूचिस्तान में लंबे समय पाकिस्तान के स्वतंत्र और सहित CAA में Balochis पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में माना जा सकता है होना करने के लिए संघर्ष किया है।
    • इसलिए, CAA, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से बाहर नहीं करता है।वे गायक अदनान सामी को उसी तरह से करना जारी रख सकते हैं, उदाहरण के लिए, नागरिकता के लिए आवेदन किया।
  • यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अल्पसंख्यकों को भी स्वचालित नागरिकता प्रदान नहीं की जाएगी।उन्हें नागरिकता अधिनियम, 1955 की तीसरी अनुसूची में निर्दिष्ट शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता होगी, अर्थात्, अच्छे चरित्र की आवश्यकता और साथ ही भारत में भौतिक निवास।
  • हरीश साल्वे, जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कानून में भारत के सबसे बड़े नामों में से एक है , ने कहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम मुस्लिम विरोधी है
    • साल्वे ने कहा कि सीएए में निर्दिष्ट देशों का अपना राज्य धर्म और इस्लामी नियम हैं।उन्होंने कहा कि इस्लामी बहुसंख्यक राष्ट्र अपने लोगों की पहचान करते हैं कि कौन इस्लाम का अनुसरण करता है और कौन नहीं। पड़ोसी देशों में शासन की समस्याओं का समाधान करना सीएए का उद्देश्य नहीं है।
    • रोहिंग्याओं के मुद्दे पर, साल्वे ने कहा कि एक कानून जो एक बुराई को संबोधित करता है उसे सभी देशों में सभी बुराइयों को संबोधित करने की आवश्यकता नहीं है। यहां यह उल्लेखनीय है कि बौद्ध बहुल राष्ट्र म्यांमार का राज्य धर्म नहीं है और म्यांमार में सीएए बिल की सुविधा नहीं है।
अधिनियम अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है
सॉवरेन स्पेस
  • शुरू करने के लिए, नागरिकता या कानूनों की न्यायसंगतता जो विदेशियों के प्रवेश को विनियमित करती है, अक्सर एक 'संप्रभु स्थान' के रूप में माना जाता है जहां अदालतें हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक हैं।
    • इस प्रकार ट्रम्प बनाम हवाई नं। 17-965, 585 यूएस (2018) में, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कई मुस्लिम देशों के यात्रा प्रतिबंध को बरकरार रखा, जिसमें विदेशी नागरिकों का विनियमन शामिल था, "मौलिक संप्रभु विशेषता सरकार की राजनीतिक द्वारा प्रयोग की जाने वाली विशेषता है जो न्यायिक से काफी हद तक प्रतिरक्षात्मक है। नियंत्रण।"
    • भारतीय अदालतों ने आम तौर पर एक समान तर्क का पालन किया है। में डेविड जॉन हॉपकिंस बनाम भारत (1997) के संघ,मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि संघ के सही नागरिकता मना करने के लिए पूर्ण और है अनुच्छेद 14 के तहत समान संरक्षण से fettered नहीं
    • इसी तरह लुइस डी राड्ट बनाम भारत संघ (1991)में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारत में एक विदेशी का अधिकार अनुच्छेद 21 तक ही सीमित है और वह अधिकार के रूप में नागरिकता नहीं मांग सकता है।
उत्तर पूर्व के संबंध में
  • नागरिक संशोधन अधिनियम असम समझौते की पवित्रता को कम नहीं करता है, जहां तक ​​कि 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख नहीं है, अवैध प्रवासियों का पता लगाने / निर्वासन के लिए निर्धारित है।
  • नागरिकता संशोधन अधिनियम असम केंद्रित नहीं है। यह पूरे देश में लागू है। नागरिकता संशोधन अधिनियम निश्चित रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ नहीं है, जिसे स्वदेशी समुदायों को अवैध प्रवासियों से बचाने के लिए अद्यतन किया जा रहा है।
  • इसके अलावा, 31 दिसंबर, 2014 की कट-ऑफ तारीख है और नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत लाभ उन धार्मिक अल्पसंख्यकों के सदस्यों के लिए उपलब्ध नहीं होंगे, जो कट-ऑफ तारीख के बाद भारत चले जाते हैं।
ऐतिहासिक संबंध
  • यह अधिनियम भारत में आने और नागरिकता प्राप्त करने के लिए अन्य देशों के हिंदुओं और ईसाइयों और सिखों को कार्टे ब्लांश नहीं देता है। बस ये तीन देश। क्यों?
  • क्योंकि इनमें से प्रत्येक को भारत के साथ सभ्यता से जोड़ा गया है।जिन परिस्थितियों में वे भारत से बंटे हुए थे, उन्होंने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जब विभाजन होने के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक आबादी घट रही है।
  • पड़ोस के अन्य देशों को शामिल करने के बारे में यह तर्क हो सकता है कि अगर जरूरत पड़ी तो श्रीलंका के तमिलों के उत्पीड़न के मामले में हम उनसे अलग से निपट सकते हैं।
निष्कर्ष
जब नागरिकता की बात आती है तो संसद ने देश के लिए कानून बनाने के लिए शक्तियों का हनन किया है। लेकिन विपक्ष और अन्य राजनीतिक दल सरकार द्वारा इस अधिनियम का आरोप लगाते हैं कि धर्मनिरपेक्षता और समानता जैसे संविधान की कुछ बुनियादी विशेषताओं का उल्लंघन करता है। यह उच्चतम न्यायालय के दरवाजे तक पहुंच सकता है जहां सर्वोच्च न्यायालय अंतिम व्याख्याकार होगा।अगर यह संवैधानिक विशेषताओं का उल्लंघन करता है और अल्ट्रा-वायर जाता है तो इसे नीचे गिरा दिया जाएगा, अगर ऐसा नहीं है तो हम कानून जारी रखेंगे।
लेकिन एक चीज जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है नई दिल्ली द्वारा एक संतुलन प्राप्त करना। क्योंकि इसमें पड़ोसी देश भी शामिल हैं।प्रवासियों की मेजबानी के लिए कोई अतिरंजित प्रयास वर्षों में अर्जित सद्भावना की कीमत पर नहीं होना चाहिए। भारत असंख्य रीति-रिवाजों और परंपराओं, धर्मों की जन्मभूमि और अतीत में सताए गए आस्थाओं के रक्षक और रक्षक होने के कारण हमेशा आगे बढ़ने वाले धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को बनाए रखना चाहिए।
नेहरू-लियाकत संधि
  • यह भारत और पाकिस्तान की सरकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संबंध में एक समझौता था, जिसे 1950 में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों, जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के बीच दिल्ली में हस्ताक्षरित किया गया था।
  • विभाजन के बाद दोनों देशों में अल्पसंख्यकों द्वारा इस तरह की संधि की आवश्यकता महसूस की गई, जो बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगों के साथ थी।
  • 1950 में, कुछ अनुमानों के अनुसार, सांप्रदायिक तनाव और दंगों जैसे कि 1950 के पूर्वी पाकिस्तान दंगों और नोआखली दंगों के बीच, एक मिलियन से अधिक हिंदू और मुस्लिम पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से चले गए।
नेहरू-लियाकत संधि के तहत
  • शरणार्थियों को अपनी संपत्ति का निपटान करने के लिए बिना अनुमति के लौटने की अनुमति दी गई थी
  • अगवा की गई महिलाओं और लूटी गई संपत्ति को वापस किया जाना था
  • जबरन रूपांतरणों को मान्यता नहीं दी गई थी
  • अल्पसंख्यक अधिकारों की पुष्टि की गई
भारत और पाकिस्तान क्या सहमत थे?
  • "भारत और पाकिस्तान की सरकारें इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि प्रत्येक अपने क्षेत्र के अल्पसंख्यकों को, नागरिकता की पूर्ण समानता, धर्म की परवाह किए बिना, जीवन, संस्कृति, संपत्ति और व्यक्तिगत सम्मान के संबंध में सुरक्षा की पूर्ण भावना, आंदोलन की स्वतंत्रता, सुनिश्चित करेगा। प्रत्येक देश के भीतर और कब्जे, बोलने और पूजा की स्वतंत्रता, कानून और नैतिकता के अधीन, ”संधि ने कहा।
  • “अल्पसंख्यकों के सदस्यों को बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों के साथ अपने देश के सार्वजनिक जीवन में भाग लेने, राजनीतिक या अन्य कार्यालय रखने और अपने देश की नागरिक और सशस्त्र बलों में सेवा करने का समान अवसर मिलेगा। दोनों सरकारें इन अधिकारों को मौलिक घोषित करती हैं और उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने का उपक्रम करती हैं। ”
प्रसंग
  • अमित शाह ने नागरिकता अधिनियम को सही ठहराने के लिए संसद में कुछ मौकों पर नेहरू-लियाकत समझौते का जिक्र किया।
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (सीएए): - यहां पीडीएफ डाउनलोड करें